सौगन्ध
सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन पुरखों की
जो अंगारों पर चलकर आजादी लाये।
हँस-हँस कर झूले जो फाँसी के फन्दों पर
जो प्रलय-घटा बनकर अरि-सर पर घहराये।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन वीरों की
जो क्रान्ति-यज्ञ में समिधा बनकर सतत जले।
बैलों के बदले जुते कहीं जो कोल्हू में
जो बलिदानों की खड्गधार पर विहँस चले।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन सिंहों की
जिनके गर्जन से भीत-शुत्र घर को भागा।
सौगन्ध तुम्हें आजाद-हिन्द के जय-स्वर की
जिसको सुनकर सोये स्वदेश का बल जागा।।
सौगन्ध तुम्हें उस बचपन की जो खोज रहा
कूड़े-कचरे के ढेरों पर अपनी रोटी
सौगन्ध तुम्हें उस यौवन की जो भटक रहा
दफ्तर-दफ्तर कहता फिरता किस्मत खोटी।।
सौगन्ध तुम्हें उन अधरों की जिनकी सुस्मिति
नित जकड़ रहीं आतंकवाद की हथकड़ियाँ।
सौगन्ध तुम्हें निर्वासित कश्मीरी जन की
जो आजादी पर वार रहे दृग-जल-लड़ियाँ।।
सौगन्ध तुम्हें ललनाओं के उस यौवन की
जिसको झिंझोड़ती जहाँ-तहाँ नर की पशुता।
सौगन्ध तुम्हें राखी के पावन धागों की
छलती-फिरती जिसको पग-पग पर दानवता।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ ! तस्र्णाई मत मौन रहो,
चुपचाप न देखो दृश्य और बरबादी का।
उत्साह-कर्म निस्वार्थ-त्याग बल-प्रभा-पुञ्ज!
यों दुस्र्पयोग मत होने दो आजादी का।।
अब और सहो मत तन-मन पर आघातों को
अब और न होने दो हत-आहत स्वाभिमान।
अब और न ढोओ वैभव बेईमानों का
अब और न खोओ आजादी की आन-बान।।
विश्वासों में विष और न तुम घुलने दो
जन के सपने शासन को और न छलनेे दो।
स्वाधीन-राष्ट्र-मंदिर के पावन-आँगन में
षडयंत्रों के काले-कुचक्र मत फलने दो।।
तुम पढ़ो मंत्र अब फिर से युग-परिवर्तन के
भोगों की भू पर त्याग-बीज फिर से बोओ।
जड़ता छोड़ो ! हुंकार उठो ! ललकार भरो
भ्रष्टाचारी के तिमिर-मध्य यूँ मत सोओ।।
डँस रहे स्वप्न जो नये सृजन के पग-पग पर
उन काले नागों पर मयूर बनकर झपटो।
सौगन्ध तुम्हें प्यारे स्वदेश के युग-प्रहरी
तस्र्णों ! जागो ! जनहित के चारों को डपटो।।
तुम तपो दिवाकर बन अम्बर की छाती पर
धरती का तम-हर ज्योति रश्मियाँ बिखराओ।
अस्तित्व वाष्पित कर भू-तल से ऊपर उठ
तपते जन-मन पर शीतल घन बन छा जाओ।।
जनता के उर के स्नेह बिन्दु सब संचित कर
तुम जलो दीप की बाती बन अविराम यहाँ।
बन शूल करो रक्षा उपवन के फूलों की
जिससे उनका सौरभ बिखरे अब जहाँ-तहाँ।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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